श्रीभगवानुवाच |
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते |
एतद्यो वेत्ति तं प्राहु: क्षेत्रज्ञ इति तद्विद: || 2||
श्रीभगवान्-उवाच-परमेश्वर ने कहा; इदम् यह; शरीरम् शरीर; कौन्तेय-कुन्तीपुत्र, अर्जुन क्षेत्रम्-कर्म का क्षेत्र; इति–इस प्रकार; अभिधीयते-कहा जाता है; एतत्-यह; यः-जो; वेत्ति-जानता है; तम्-वह मनुष्यः प्राहुः-कहा जाता है; क्षेत्र-ज्ञः-क्षेत्र को जानने वाला; इति-इस प्रकार; तत्-विदः-इस सत्य को जानने वाला।
BG 13.2: परम पुरुषोतम भगवान ने कहाः हे अर्जुन! इस शरीर को क्षेत्र (कर्म क्षेत्र) के रूप में परिभाषित किया गया है और जो इस शरीर को जान जाता है उसे क्षेत्रज्ञ (शरीर का ज्ञाता) कहा जाता है।
श्रीभगवानुवाच |
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते |
एतद्यो वेत्ति तं प्राहु: क्षेत्रज्ञ इति तद्विद: || 2||
परम पुरुषोतम भगवान ने कहाः हे अर्जुन! इस शरीर को क्षेत्र (कर्म क्षेत्र) के रूप में परिभाषित किया गया है …
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श्रीकृष्ण शरीर और आत्मा के बीच के भेद के विषय पर चर्चा आरम्भ करते हैं। आत्मा दिव्य है। यह न तो खा, देख, सूंघ, सुन और स्वाद ले सकती है और न ही स्पर्श कर सकती है। यह इन सब क्रियाकलापों को शरीर, मन और बुद्धि के माध्यम से करती है जिन्हें कर्म क्षेत्र के रूप में परिभाषित किया गया है। आधुनिक विज्ञान में हमें 'उर्जा शक्ति का क्षेत्र' जैसे प्रयोग मिलते हैं। किसी चुम्बक के चारों ओर चुम्बकीय क्षेत्र होता है जो बिजली उत्पन्न करता है। आवेशित बिजली के चारों ओर बल क्षेत्र होता है। इसी प्रकार शरीर मनुष्य के कर्मों का आयतन है। इसलिए इसे क्षेत्र (कर्म क्षेत्र) कहा जाता है। आत्मा शरीर, मन और बुद्धि से भिन्न है किन्तु यह अपनी दिव्य प्रकृति को भुला बैठी है और अपनी पहचान इन भौतिक अस्तित्त्वों के रूप में करती है। किन्तु फिर भी इसे शरीर का ज्ञान होता है इसलिए इसे क्षेत्रज्ञ अर्थात् शरीर के क्षेत्र को जानने वाला कहा जाता है। यह शब्दावली आत्मज्ञानी ऋषियों द्वारा दी गयी है जो आत्मज्ञान में स्थित थे और जिन्होंने शरीर से पृथक् अपनी पहचान को जान लिया था।